Friday, October 30, 2015

करवाँचौथ के शुभ अवसर पर सभी माताओं-बहनों और बेटियों के लिये.
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सनातन धर्म और भारतीय समाज मे नारी का सदा से सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है पर हजार साल तक मुस्लिम अक्रांता ने पूजनीय नारियों का बलात्कार, अपहरण, हरम, हत्या, बहू-विवाह, जबरन धरमांतरण आदि कर भारतीय समाज को दूषित किया, तो परिणाम-स्वरूप बेचारे हिन्दुओं को अपनी बहू-बेटी की रक्षा के लिये सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा-प्रथा, कन्या हत्या जैसे ना जाने कितने पाप करने पर मजबूर होना पड़ा, कालान्तर मे यही कुप्रथाएँ भारतीय समाज मे परम्परओं के रूप जानी जाने लगी, हालांकि अब इन कुप्रथाओं से निजात पाया जा चुका है।
दूसरी ओर 200 साल अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर मे धूर्त-शातिर मिशीनरी हिन्दुओं के धर्मग्रंथ पुराण-उपनिषद-रामायण-रामचरित मानस-महाभारत आदि मे कई जगह ना सिर्फ मिलावट कीया बल्कि नये-नये अध्याय और श्लोक-मंत्र और दोहे तक जोड़ दिये। एक विशेष विधि से संरक्षित रहने की बजह से वेद ही सिर्फ सुरक्षित बच पाया। http://agniveer.com/why-vedas-cannot-be-changed-hi/
श्रीमद भगवद गीता जी का परमज्ञान देने वाले योगिराज कृष्ण को नहाती गोपियों के कपड़े चुराने वाला लम्पट, जरासंध के कारगर मे बंद 16008 कन्याओं को मुक्त कर उनका उद्धार करने वाले कृष्ण को 16008 बीबी रखने वाला बताया जाने लगा। माता शबरी के झूठे बेर खाने वाले, मल्लाह केबट और गिद्धराज जटायु को मित्र-पिता का स्थान देने वाले, बंदरों और राक्षस विभीषन से भी प्रेम रखने वाले भक्तवत्सल , एक पत्निव्रता प्रभु श्रीराम को शम्बूक वध की बनावटी कहानी बना शूद्र बिरोधी साबित करने की कोशिश की गयी।
शूद्र, गँवार, ढोल, पशु, नारी, यह सब ताड़ना के अधिकारी जैसा घृणित दोहा रामचरित मानस मे जोड़ परमस्नेही, मर्यादापुरुषोत्तम राम को नारी-बिरोधी और शूद्र-बिरोधी दिखाने का प्रयास हुआ, पेरियार रामायण ने तो सारी हदें पार कर रावण को धर्मात्मा और श्रीराम जी को पापी साबित करने की कोशिस की। मुग़ल अकबर के शासनकाल मे तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस को इन मिशनरियों ने ऐसे दोहे और एक नये काण्ड "उत्तर काण्ड" जोड़ गंदा किया जिसे काफी बाद मे रामचरितमानस मे जोड़ा गया।
जबकि रामचरित मानस मे भगवान श्रीराम कहते हैं :-
अनुज वधू, भगिनी, सुता, सुत नारी । सुनु सठ कन्या सम ए चारी ।।
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई । ताहि बधे कछु पाप न होई।
अर्थात :- अनुज वधू - छोटे भाई की पत्नी, भगिनी - बहन, सुता - बेटी, सुत नारी - बेटे की पत्नी ) अर्थात समाज में नारियों का स्थान सबसे ऊपर है और उन पर अत्याचार करने वालों को पृथ्वी पर जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। उनका वध करने पर किसी प्रकार का पाप नहीं लगता है।
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हिन्दू धर्म ग्रंथों मे जिन जिन नारियों को पूजनीय स्थान हासिल है, जिनके सतीत्व की महिमा का बखान देवताओं ने भी किया जैसे गंधारी, कुन्ती, सीता, द्रौपदी, सती अनुसूया, तुलसी और गंगा ! इन सभी के सतीत्व पर लांक्षन लगाने का प्रयास इन नीच मिशनिरी और मलेच्छ जमात वालों ने किया।
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आधुनिक समाज आज जिस नारी उत्थान और नारी सम्मान की बात कर रहा है, आज से हजारों साल पहले यह ज्ञान स्वयम् ईश्वर ने मानव समाज को वेद और गीता जी मे दे चुके हैं --- आइये देखिये :-
1) वेदों में पुत्रियों की कामना की गयी हैं :-
ऋग्वेद 10/159/3 – मेरे पुत्र शत्रु हन्ता हों और पुत्री भी तेजस्वनी हो।
ऋग्वेद 8/31/8 यज्ञ करने वाले पति-पत्नी और कुमारियों वाले होते हैं।
ऋग्वेद 9/67/10 प्रति प्रहर हमारी रक्षा करने वाला पूषा परमेश्वर हमें कन्यायों का भागी बनायें अर्थात कन्या प्रदान करे।
अथर्ववेद 10/3/20- जैसा यश कन्या में होता हैं वैसा यश मुझे प्राप्त हो।
2) नारी जाति को यज्ञ का अधिकार, नारियों के बिना यज्ञ को निष्फल बताया गया है :-
ऋग्वेद 8/31/5-8 में कहा गया हैं की जो पति-पत्नी समान मनवाले होकर यज्ञ करते हैं उन्हें अन्न, पुष्प, हिरण्य आदि की कमी नहीं रहती।
ऋग्वेद 1/72/5 – विद्वान लोग पत्नी सहित यज्ञ में बैठते हैं और नमस्करणीय को नमस्कार करते हैं।
ऋग्वेद 8/33/19 में स्त्री हि ब्रह्मा बभूबिथ अर्थात स्त्री यज्ञ की ब्रह्मा बनें कहा गया हैं।
3) नारी जाति को शिक्षा का अधिकार :-
ऋग्वेद 3/9/23- विद्वानों को यही योग्यता हैं की सब कुमार और कुमारियों को पुन्दित बनावे, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों।
ऋग्वेद 2/41/16- जितनी कुमारी हैं वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करे और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी उन विदुषियों से ऐसी प्रार्थना करें की आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें।
4) पुरुषों को एक पत्निव्रता होने का आदेश ईश्वर ने वेद मे दिया :-
अथर्ववेद 7/38/4 पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो. अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।
ऋग्वेद 10/101/11 में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं -- जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं, वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं ! इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना शाष्ट्रसम्मत या उचित नहीं हैं।
5) वेद बाल विवाह के विरूद्ध हैं :-
अथर्ववेद के ब्रहमचर्य सूक्त 11/5/18 वें मंत्र में कहा गया हैं की ब्रहमचर्य (सादगी, संयम और तपस्या) का जीवन बिता कर कन्या युवा पति को प्राप्त करती हैं।
अथर्ववेद 2/30/5 में भी परस्पर युवक और युवती एक दुसरे को प्राप्त करके कह रहे हैं की मैं पतिकामा अर्थात पति की कामना वाली और यह तू जनीकाम अर्थात पत्नी की कामना वाला दोनों मिल गए हैं.युवा अवस्था में ही पति-पत्नी की कामना की इच्छा हो सकती हैं छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में नहीं।
6) वेद सती-प्रथा के सख्त खिलाफ हैं और पुनर्विवाह और विधबा विबाह का आदेश देते हैं :-
अथर्ववेद 19/3/2 में कहते हैं “हे मृत पति की धर्मपत्नी ! तू मृत के पास से उठकर जीवलोक में आ, तू इस निष्प्राण पति के पास क्यों परी हुई हैं? पाणीग्रहणकर्ता पति से तू संतान पा चुकी हैं, उसका पालन पोषण कर।
ऋग्वेद 10/18/8 हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’
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वेदों में पत्नी को उषा के सामान प्रकाशवती, वीरांगना, वीर प्रसवा, विद्या अलंकृता, स्नेहमयी माँ, पतिव्रता, अन्नपूर्णा, सदगृहणी, सम्राज्ञी आदि से संबोधित किया गया हैं जो निश्चित रूप से नारी जाति को उचित सम्मान प्रदान करते हैं।
सनातन धर्म मे शिव और शक्ति को परम परमात्मा का रूप माना गया है, यह धर्म वहा है जहां नारियाँ माता सीता, दुर्गा, काली, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप मे पूजी जाती है। अतः दुष्टों के इतने प्रयास के बाबजूद यह धर्म ज्ञान-दर्शन-अध्यात्म की अविरल धरा मे बहता आगे बढ़ता ही जा रहा है। मानव समाज के लिये सर्वश्रेष्ठ, कल्याणकारी उत्तम मार्ग सत्य सनातन वैदिक मार्ग है
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इस पोस्ट को वेद के इस मंत्र के साथ समाप्त करना चाहूंगा :-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: __/\__ ‪#‎DrAlam‬

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